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समाज और मै

आदमी पुतला होता हैं अपनी इच्छाओ, प्रविर्तियों, आदतों का। कुछ जिस परिवेश में पैदा हुआ हैं और जी रहा हैं उनका असर होता हैं और कुछ वो खुद चुनता है।  एक आम और ख़ास इंसान में फर्क जानने या फिर आकलन करने का ये तरीका भी हो सकता हैं की कितना प्रतिशत उसपे समाज का हैं और कितना प्रतिशत वो खुद अपनी प्रविर्तियों की चुन के अपना जीवन में उतरा हैं।  एक मसहूर ववसाई और इन्वेस्टर नवल रविकांत का कहना हैं की "इंसान जितना फिटिन होता हैं समाज में वो उतना ही कम् आज़ाद होता हैं।   एक आम इंसान का जीवन उस नदी के जैसा होता हैं, जिसे पता नहीं हैं की कहा जाना हैं और ना ही किस रस्ते जाना हैं, तो वो पामाल रास्तो का सफर तय करती हैं या फिर कोई और रास्ता वो सुलभ हो उसकी ओर रुख कर लेती हैं।  पर समाज में केवल सुलभ शौचालय उपस्थित होते हैं, और अगर वो अपने जीवन का दूर समाज के हाथो सौप देता हैं तो वो उसे शौचालय की और ही लेके जाती है।   एक सही जवान जीने के लोए इंसान को समाज का ही बलिदान देना पड़ता हैं और अगर जरूरत पड़ी तो खुद की भी।  

हंसा तो मोती चूने–(ओशो)

  हंसा तो मोती चूने–(ओशो) प्रवचन–10 यह महलों ,  यह तख्तों ,  यह ताजों की दुनिया यह इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया यह दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! हर एक जिस्म घायल ,  हर इक रूह प्यासी निगाहों में उलझन ,  दिलों में उदासी यह दुनिया है या आलमे-बदहवासी यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! यहां इक खिलौना है इन्सां की हस्ती यह बस्ती है मुर्दा -परस्तों की बस्ती यहां पर तो जीवन से है मौत सस्ती यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! जवानी भटकती है बदकार बनकर जवा जिस्म सजते हैं बाजार बनकर यहां प्यार होता है व्योपार बनकर यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! यह दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है वफा कुछ नहीं ,  दोस्ती कुछ नहीं है जहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! जला दो उसे फूंक डालो यह दुनिया मेरे सामने से हटा लो यह दुनिया तुम्हारी है तुम ही सम्हालो यह दुनिया यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! -------------------------------------------------- चहल -पहल की इस नगरी में हम तो निपट बिराने हैं हम इतने ...

ओशो ने कही कविताये Public Figure: हंसा तो मोती चूने–(ओशो) प्रवचन–10

ओशो ने कही कविताये Public Figure: हंसा तो मोती चूने–(ओशो) प्रवचन–10 : यह महलों , यह तख्तों , यह ताजों की दुनिया यह इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया यह दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया यह दुनिया अगर मिल भी जाए ...

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