Posts

Showing posts from January, 2025

समाज और मै

आदमी पुतला होता हैं अपनी इच्छाओ, प्रविर्तियों, आदतों का। कुछ जिस परिवेश में पैदा हुआ हैं और जी रहा हैं उनका असर होता हैं और कुछ वो खुद चुनता है।  एक आम और ख़ास इंसान में फर्क जानने या फिर आकलन करने का ये तरीका भी हो सकता हैं की कितना प्रतिशत उसपे समाज का हैं और कितना प्रतिशत वो खुद अपनी प्रविर्तियों की चुन के अपना जीवन में उतरा हैं।  एक मसहूर ववसाई और इन्वेस्टर नवल रविकांत का कहना हैं की "इंसान जितना फिटिन होता हैं समाज में वो उतना ही कम् आज़ाद होता हैं।   एक आम इंसान का जीवन उस नदी के जैसा होता हैं, जिसे पता नहीं हैं की कहा जाना हैं और ना ही किस रस्ते जाना हैं, तो वो पामाल रास्तो का सफर तय करती हैं या फिर कोई और रास्ता वो सुलभ हो उसकी ओर रुख कर लेती हैं।  पर समाज में केवल सुलभ शौचालय उपस्थित होते हैं, और अगर वो अपने जीवन का दूर समाज के हाथो सौप देता हैं तो वो उसे शौचालय की और ही लेके जाती है।   एक सही जवान जीने के लोए इंसान को समाज का ही बलिदान देना पड़ता हैं और अगर जरूरत पड़ी तो खुद की भी।